Monday, June 21, 2010

उनका देश शुरू से स्वार्थी हमारी सरकार हमेशा से कायर

कोई दोहरा चरित्र नहीं

कल्पेश याग्निक

अमेरिका को क्यों कोस रहे हैं? हम अपने भीतर क्यों नहीं झांक रहे? उसने मैक्सिको की खाड़ी में तेल रिसाव पर कठोर कार्रवाई की, हम भोपाल गैस रिसाव पर अमेरिकी चुप्पी से तुलना कर रहे हैं। आखिर क्यॊं? हमारा तर्क है : मैक्सिको रिसाव त्रासदी में 11 लोग मरे हैं। भोपाल गैस रिसाव में 15 हजार लोग मारे गए थे। अमेरिका ने तुरंत 20 बिलियन डॉलर का मुआजा देने के लिए ब्रिटिश पेट्रोलियम को दमनर्पूक मजबूर कर दिया- वहीं भोपाल के गुनहगार यूनियन कार्बाइड के चेयरमैन वारेन एंडरसन के प्रत्यर्पण के लिए वह कभी राजी नहीं हुआ। इसलिए यह सब वाशिंगटन का दोहरा चरित्र उजागर करता है।

किंतु वास्तव में ऐसा नहीं है। यह सब कुछ तो अमेरिकी चरित्र के अनुसार ही हो रहा है। यही नहीं, हमारा तर्क भी तर्क कम, विलाप अधिक है। आइए, देखें, कैसे? अमेरिका है क्या? एक स्वार्थी देश। एक कारोबारी। शुरू से। हमेशा अपना ही फायदा देखनेवाला। उस पर हमला हुआ, तो दो-दो देशों पर हमला कर दिया। और हम पर हमला हो, तो हेडली को सौंपने तक को तैयार नहीं।

..और हमारा भारत क्या है? एक महान, उदारादी देश। किंतु जिसका इतिहास पराजित राजाओं, असफल शासकों और कायर सरकारों का रहा है। देखा जाए तो दोनों अपना-अपना चरित्र ही जी रहे हैं। मैक्सिको की खाड़ी में हुए तेल रिसाव से उनके पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचा तो उन्होंने दोषी कंपनी ब्रिटिश पेट्रोलियम को और ज्यादा नुकसान पहुंचा दिया। लुईजियाना सहित आसपास के चार राज्यों के कारोबार बर्बाद होते देख उन्होंने तुरंत ब्रिटिश पेट्रोलियम को सजा सुनाई : 34 बिलियन डॉलर मांगे। कंपनी नहीं मानी तो राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कंपनी के चेयरमैन कार्ल टेनरिक सनबर्ग और सीईओ टोनी हेवर्ड को सीधे व्हाइट हाउस तलब किया।

पचास अफसरों की मौजूदगी में एक-एक डॉलर का हिसाब लिखाया। 20 बिलियन डॉलर का मुआवजा शुरुआती तौर पर तय किया। इनमें तीन बिलियन तो इसी तिमाही में देने पड़ेंगे। फिर सवा बिलियन हर तीसरे माह। उसे बांटने का जिट्ठमा भी एक फंड को उसी बैठक में दे दिया। जिसकी निगरानी सख्त मिजाज वाले स्वतंत्र वकील कैनेथ फिनबर्ग को सौंपी। फिनबर्ग ने ही 9/11 हमलों के बाद मुआजा बंटवाया था जिसमें एक डॉलर की भी हेराफेरी नहीं होने दी थी।

अब हमारी सरकार की कार्राई पर तुलनात्मक नजर डालिए

हजारों मौतों के बीच जब मानता का गुनहगार, यूनियन कार्बाइड का चेयरमैन भारत पहुंचा तो हमारे विदेश सचिव एम. के. रसगोत्रा ने सबसे पहले उसे सुरक्षित वापसी की गारंटी दी। वे भी भारत सरकार की ओर से। फिर भोपाल में मुख्यमंत्री अर्जुनसिंह ने उसे गिरफ्तार कर लिया। बल्कि गिरफ्तार दिखा दिया। क्योंकि गिरफ्तार आरोपी को कोई उसी के गेस्ट हाउस में आराम करने नहीं भेजता। उधर अमेरिकी दूतावास ने हमारे विदेश सचिव से एंडरसन की रिहाई का आग्रह किया - तो उसे हमारी सरकार ने स्वतः ही दबाव मान लिया। जिस नाटकीय ढंग से गिरफ्तारी - उससे ज्यादा रहस्यमय रिहाई। धारा कमजोर कर दी गई। अफसर विदा करने गए। क्यॊंकि दिल्ली में गृहमंत्री पी.वी. नरसिंह राव ने सुरक्षित वापसी का रसगोत्रा का वादा निभाने की ठान ली। इन सबके बीच प्रधानमंत्री राजीव गांधी एकदम चुप रहे। सुबूत हैं इसके। रसगोत्रा ने साफ कहा है कि राव की बात का राजीव गांधी ने विरॊध नहीं किया था यानी न विरॊध- न समर्थन ।

वैसे ही अर्जुनसिंह ने पत्रकार वार्ता में कहा था : एंडरसन की रिहाई की बात राजीव गांधी को बताई गई थी - और उन्होंने सुन ली थी। एक शक्तिशाली देश की कायर सरकार की ही तो बानगी थी ये सब। फिर मुआवजे पर हमारी सरकार का रुख देखिए। वहां बराक ओबामा ने 20 बिलियन डॉलर को अंतिम आंकड़ा नहीं माना है। जैसे-जैसे जांच होगी, आंकड़ा बढ़ भी सकता है। आपराधिक मुकदमा भी जारी रहेगा। जबकि हमारी सरकार ने यूनियन कार्बाइड से 3.3 बिलियन डॉलर मुआवजे में मांगे थे। पांच साल में ही आधा बिलियन से भी कम (460 मिलियन डॉलर) पर कोर्ट से बाहर समझौता कर लिया। आखिर क्यों? कोई जवाब नहीं। जिस कार्रवाई में अमेरिका को महज 53 दिन लगे हम 26 बरसों में उसकी आधी भी नहीं कर पाएं। जो की वॊ भी कमजोरी भरी। उनके राष्ट्रपति ने कंपनी के बोर्ड को अपने आवास पर तलबकर सबकुछ लिखा लिया, हमारे किसी प्रधानमंत्री ने, किसी मुख्यमंत्री ने तो कभी सपने में भी यूनियन कार्बाइड पर ऐसा कुछ करने का नहीं सोचा।



अब हमारी सरकार पर भास्कर अभियान के तहत भारी दबाव बन गया है कि वह सारे मामले को फिर से जांचे, केस खोले, मुआवजा बढ़ाए और खतरनाक मलबा हटाने के लिए कार्बाइड की मालिक बनी कंपनी डाऊ केमिकल्स को 100 करोड़ खर्च करने जिम्मेदार बनाने पर मजबूर करे। उम्मीद ही की जा सकती है कि कायरता का दाग़ हटाकर, सरकार इस देश की शक्ति के आधार पर कठोर कार्रवाई करेगी।

Sunday, January 27, 2008

एक नया सवेरा

फिर एक नया प्रयास